हमारे बारे में

हमारा इतिहास

संस्था ने वर्ष 2001 में कारीगरों के सर्वांगीण विकास को लेकर अपनी यात्रा मध्य प्रदेष चर्मोद्योग संघ के बेनर पर प्रारंभ की ।

संस्था को विधिवत पंजीयन कराने के समय मध्य प्रदेष शब्द के कारण नाम के पंजीयन में आपत्ति के पश्चात नाम चर्मपदत्राण उद्यमि विकास समिति रखना निश्चित किया। वर्ष 2004 में पंजीयन पश्चात संस्था का कार्य इसी नाम से संचालित है।

चर्मपदत्राण उद्यमी विकास समिति विगत 25 वर्षों से कारीगर समाज के सर्वांगीण विकास के लिए कार्यरत है संस्था द्वारा कारीगर समाज के लिये विभिन्न विकास  कार्य किए गए हैं ,जिसमें प्रमुख रुप से ग्वालियर में  सड़क पर बैठकर रिपेयर, पॉलिश करने वाले  181 मोची बंधुओं को 4 बाय 6 की पक्की गुमठी नगर निगम ग्वालियर एवं मध्यप्रदेश शासन के सहयोग से प्रदान की गई है ।
संस्था ने मोची समाज के सड़क पर बैठकर रिपेयर, पॉलिश करने वाले बंधुओं  का पूरे प्रदेश में सर्वे किया है जिला स्तर पर 3276 लोग वर्ष 2012 में चिन्हित  किये गये थे
संस्था द्वारा राज्य में कारीगर आयोग का गठन करने हेतु जो प्रयास किया गया था वो 2017 सफल हुआ । राज्य में कारीगर आयोग देश का पहला कारीगर आयोग है।

दृष्टि और मूल्य

देश में बेरोजगारी की समस्या का समाधान यदि कुछ है तो वह यह है कि हमें हमारी प्राचीन भारतीय अर्थव्यवस्था की ओर जाना पड़ेगा, जहां एक बेटे-बेटी को हुनर सिखाने की आवश्यकता नहीं थी, वह अपने पिता को कार्य करता देखकर ही उस हुनर में पारंगत हो जाता था ।
हमारा लक्ष्य है कि हम आज के बेरोजगार युवकों को जो कहते हमारे पास काम नहीं है। “जब हाथ हैं तो काम है” तो काम करो और आज काम करने के लिए हुनर सीखने की आवश्यकता है। आज हम उसी हुनर को आमजन तक फिर से पहुंचाएंगे। उन्हें निशुल्क प्रशिक्षण देंगे जिसमें किसी प्रकार की कोई परीक्षा की बाध्यता नहीं होगी। सीधे औजार से काम कीजिए, काम सीखिए और काम सीखने के पश्चात अपना स्वयं का रोजगार स्थापित करने के लिए संस्था हरसंभव मदद करेगी यही संस्था का लक्ष्य है।

दृष्टि और मूल्य

देश में बेरोजगारी की समस्या का समाधान यदि कुछ है तो वह यह है कि हमें हमारी प्राचीन भारतीय अर्थव्यवस्था की ओर जाना पड़ेगा, जहां एक बेटे-बेटी को हुनर सिखाने की आवश्यकता नहीं थी, वह अपने पिता को कार्य करता देखकर ही उस हुनर में पारंगत हो जाता था ।
हमारा लक्ष्य है कि हम आज के बेरोजगार युवकों को जो कहते हमारे पास काम नहीं है। “जब हाथ हैं तो काम है” तो काम करो और आज काम करने के लिए हुनर सीखने की आवश्यकता है। आज हम उसी हुनर को आमजन तक फिर से पहुंचाएंगे। उन्हें निशुल्क प्रशिक्षण देंगे जिसमें किसी प्रकार की कोई परीक्षा की बाध्यता नहीं होगी। सीधे औजार से काम कीजिए, काम सीखिए और काम सीखने के पश्चात अपना स्वयं का रोजगार स्थापित करने के लिए संस्था हरसंभव मदद करेगी यही संस्था का लक्ष्य है।

व्यक्तित्व विकास

संस्था व्यक्ति निर्माण में विश्वास रखती है हर एक व्यक्ति जो अपना जीवन यापन करना चाहता है अपने परिवार को पढ़ाना चाहता है उसके लिए आवश्यक है उसका परिपूर्ण होना परिपूर्ण वयस्क के साथ में व्यवसायिक  ज्ञान होना भी और उसको सब होना एक अच्छा नागरिक होना देश के प्रति समर्पित होना अपने लोगों के प्रति ईमानदार होना यह सारा व्यवसाई ज्ञान भी संस्थान द्वारा उनको समय-समय पर दिन।

संस्था द्वारा जो व्यवसायिक प्रशिक्षण प्रदान किया जाएगा उसमें चर्म शिल्प, बांस शिल्प, कॉस्ट शिल्प, माटी शिल्प, स्वर्ण शिल्प के अतिरिक्त जो अन्य 12 विधाएं मानी जाती हैं उन सभी का प्रशिक्षण दिया जाएगा किंतु प्रारंभिक चरण में हम कास्ठ कला, चर्म कला और मूर्ति कला पर काम करेंगे इन विधाओं में प्रशिक्षणार्थी को प्रशिक्षण सभी तरह के औजारों से काम करना, औजारों में धार करना, वस्तुओं का निर्माण करना आदि बारीकियों समझाया जाएगा।

लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड

संस्था के अध्यक्ष द्वारा वर्ष 2001 में निर्मित 10 फुट लंबी विश्व की सबसे बड़ी चप्पल जो लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड में दर्ज है।

इस चप्पल को बनाने में लगभग १० दिन का समय लगा था , इसे बनाने में उसी कच्चे माल़ का उपयोग किया गया जो साधारण चप्पल बनाने में किया जाता है । यह चप्पल १० फूट लंबी है और इसे बनाने में ८ कारीगरों का श्रम लगा था । ६० किलोग्राम वजनी इस चप्पल को उस समय बनाने में लगभग १० हजार रूपये का खर्च आया था । 

लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड

संस्था के अध्यक्ष द्वारा वर्ष 2009 में निर्मित 10 फुट लंबी विश्व की सबसे बड़ी चप्पल जो लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड में दर्ज है।

इस चप्पल को बनाने में लगभग १० दिन का समय लगा था , इसे बनाने में उसी कच्चे माल़ का उपयोग किया गया जो साधारण चप्पल बनाने में किया जाता है । यह चप्पल १० फूट लंबी है और इसे बनाने में ८ कारीगरों का श्रम लगा था । ६० किलोग्राम वजनी इस चप्पल को उस समय बनाने में लगभग १० हजार रूपये का खर्च आया था । 

हम क्या करते हैं?

हम शिक्षित करते हैं और उन्हें स्वरोजगार के लिए सशक्त बनाते हैं! यहां कुछ प्रशिक्षण दिए गए हैं जो हम निःशुल्क देते हैं

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चर्म शिल्प

चर्म शिल्प अंग्रेजी में इसे लैदर क्राफ्ट कहते है। इसके अंतर्गत चप्पल, जूते, सैंडिल, स्लीपर, बैग, बैल्ट, पर्स, खिलौने आदि कई प्रकार की वस्तुएं बनाई जाती हैं और बहुत पसंद भी की जाती है।

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बांस शिल्प

आजकल आधुनिक युग में बांस की टोकरी या सुप का चलन नगर में कम हो गया है फिर भी गांव में आज भी बांस के बने हुए टोकरी हैं और सुप  एवं बांस से बने हुए विभिन्न प्रकार की वस्तुएं आज भी प्रचलन में है बांस का जो वास्तविक नाम है वह वॉइस मतलब जो कभी खत्म नहीं होता बांस एक ऐसी वस्तु है जो उसको सबसे शुद्ध माना गया है 

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काट शिल्प

काष्ठ शिल्प की बात करें तो   टेबल कुर्सी और विभिन्न प्रकार की लकड़ीयों से बना हुआ सामान उसे हम काष्ठ शिल्प कहते हैं आज के वर्तमान (मॉर्डन) युग में की हम बात करें तो लकड़ी का सामान जगह-जगह देखने को मिलता है।

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माटी शिल्प

 माटी शिल्प की बात करें तो मटका, तवा, चुल्हा आदि वस्तुएं हमारे ध्यान में आती है। और इस तरह की वस्तु हमारे ध्यान में आती है। लेकिन वर्तमान युग में माटी से बनी हुई विभिन्न प्रकार की वस्तुएं हम देखते है, पानी पीने की बोतल, चम्मच करछी, गिलास, कढ़ाई, तवा, कुकर , भगोने, गृह सज्जा का सामान, आदि दैनिक जीवन मे उपयोग में आते है वह भी माटी की बनती है वह भी मिल रही है

हमारी प्रेरणा

गुरूजी स्वर्गीय श्री रवीन्द्र शर्मा जी

(५ सितंबर १ ९ ५२ – २ ९ अप्रैल २०१ -), जिन्हें सार्वजनिक रूप से गुरुजी के नाम से जाना जाता है, मूल भारतीय संदर्भ में एक भारतीय कलाकार, शिल्पकार, कहानीकार, इतिहासकार, शिक्षावादी, समाजशास्त्री, अर्थशास्त्री थे। वह आदिलाबाद के कला आश्रम के संस्थापक थे और उन्हें 2014 में आंध्र प्रदेश सरकार द्वारा कला रत्न पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। गुरुजी को भारत के प्राचीन ग्रामीण और आदिवासी कला रूपों के संरक्षण में लगभग चार दशकों तक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने का श्रेय दिया जाता है।

 

परम आदरणीय श्री सुरेश जी सोनी​

आदरणीय श्री सुरेश सोनी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संयुक्त महासचिव हैं। वह दर्शनशास्त्र में स्नातकोत्तर हैं। एक जिज्ञासु पाठक श्री सोनी अपने बौद्धिक (व्याख्यान) की उच्च बौद्धिक सामग्री के लिए जाने जाते हैं। वह जीवन में बहुत ही कम उम्र में संघ के प्रति आकर्षित हो गए थे और इंदौर से एक प्रचारक के रूप में अपना करियर शुरू किया था। इससे पहले, वह सह-प्रचार प्रमुख थे

संस्था द्वारा आयोजित कुछ कार्यक्रम

संस्था भवन का डिजाइन